Exam And Children(परिछाएँ और बच्चे)

Exam And Children(परिछाएँ और बच्चे)

exam and children

Exam and Children

यूं तो पूरी जिंदगी एक इम्तिहान ही है लेकिन विशेष रूप से नियमित परीक्षाएं, उसके बाद परिणाम बच्चे से बहुत हद तक उनका बचपन छीन लेते हैं .हमारे तथाकथित बड़े विद्यालयों में 3 साल की उम्र के बच्चे की प्रवेश परीक्षा ली जाती है.

मान लीजिए कि विद्यालय के मापदंड के हिसाब से बालक-बालिका ने योग्यता स्तर अर्जित नहीं किया तो इतनी छोटी उम्र में ही परीक्षार्थी पर असफलता का ठप्पा लग गया . यह ठप्पे केवल कागज पर नहीं लगते, बच्चे के मन पर भी लगते हैं .

जीवन प्रतियोगिता ही बनकर रह गया है. जो पीछे रह गया वह ‘बेचारा’ है  ‘बेचारा’ होने के साथ-साथ वाला ‘अयोग्य’ है और फिर जो नीचे उतरते-उतरते यह परीक्षा प्रणालियां बच्चे को “निकम्मा” साबित कर देती हैं. बच्चे विशेषकर विद्यालय स्तर के जीवन को जाने कैसे-कैसे पार करते हैं. परीक्षा के बाद जब उत्तर पुस्तिका या अंकतालिका मिलती है तो बच्चों की धड़कनों पर बहुत दबाव होता है.

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असफलता अपेक्षा के अनुरूप परिणाम ना आने की स्थिति में बच्चे भयंकर मानसिक तनाव से गुजरते हैं उन्हें भी हीनता बौद्ध का एहसास होता है और यदि उन्हें ऐसा एहसास ना भी  हो तो अभिभावक ,सहपाठी, रिश्तेदार साथ पढ़ने वाले बच्चे और अध्यापक-अध्यापिका भी इसी समय अपनी तरफ से अनेक तरह से बच्चे को प्रताड़ित करते हैं और नीचा दिखाते हैं कोई पूछ सकता है और क्यों न पूछे . आखिर यह परीक्षाएं न ली जाए तो क्या किया जाए जिसके कारण बच्चे पढ़ाई लिखाई करने को बाध्य हो इसी बहाने अधिकांश विद्यार्थी अंतिम दिनों में ही कुछ परिश्रम करते तो हैं

इन प्रश्नों से बचकर नहीं जाया जा सकता जिन घरों में भाई की लाठी से बच्चों को हाका जाता है उन बच्चों के भावी जीवन में कैसी और कितनी सफलताएं आती हैं इससे भली-भांति देखा समझा जा सकता है

चलिए परीक्षाओं के भय से मुक्ति के साथ किसी परीक्षा प्रणाली की खोज करते हैं एक बार 3 घंटे की परीक्षा को यह अधिकार क्यों दिया जाए कि केवल कुछ प्रश्नों के उत्तरों के आधार पर छात्र छात्रा को योग्य योग्य अयोग्य घोषित कर दिया जाए

असल में होना यह चाहिए कि बालक का जीवन में सतत मूल्यांकन हो जहां वह कमजोर पड़ रहा है वहां उसकी मदद की जाए जिस क्षेत्र विशेष में उसकी रुचि है उस क्षेत्र की पहचान की जाए हर व्यक्ति हर क्षेत्र या विषय में दक्षता प्राप्त करने की बराबर क्षमता नहीं रखता ऐसे में परीक्षा केंद्रित होने की अपेक्षा हमारा मूल्यांकन बच्चे को निकट से समझने और आलोकित करने वाला होना चाहिए

लेकिन कहीं ना कहीं किसी ना किसी स्तर पर तो योग्यता का परीक्षण होना ही होता है प्रारंभ में चीजें यदि इतनी सुगम बना दी गई तो आगे जाकर बच्चे चुनौतियों का सामना कैसे कर पाएंगे प्रश्नों के हल सीधी रेखा के रूप में कभी नहीं होते जीवन परीक्षाओं की जटिलता से पूरी तरह नहीं बच सकता लेकिन शिक्षण कम हो और परीक्षण ज्यादा तो ऐसे में सोचना तो पड़ेगा ही अभी तैयारी ठीक से नहीं हुई और परीक्षा आ गई तो परीक्षा का भय जन्म लेगा ही लेगा बच्चे शिक्षा कर्म और परीक्षा इन तीनों पर ज्यादा जिम्मेदारी से सोचना होगा.

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