Eassay-Jharne Ki Aatmktha(झरने की आत्मकथा)

Eassay Jharne Ki Aatmktha(झरने की आत्मकथा)

Jharne Ki Aatmktha(झरने की आत्मकथा)

Jharne Ki Aatmktha(झरने की आत्मकथा)

Eassay Jharne Ki Aatmktha:

यह मनुष्य की विवस्ता है कि वह कभी फूल की आत्मकथा लिखता है, कभी झरने की. असल में इसके पीछे एक अजीब सी त्रासदी अजीब सा सुख है .मनुष्य ही नहीं दूसरे प्राणी भी अकेले कभी नहीं जीते .अकेला होते ही प्राणी मरने लगता है .इसलिए हम फूल के साथ-साथ खिलने का अनुभव जीते हैं और झरने के साथ-साथ बहने का. प्रारंभ होना ,बहना और फिर कहीं समर्पित होकर मिट जाना यही जीवन है .जो जीवन के इन तीन चरणों को नहीं जीते वे जीवन के भीतर उतरते ही नहीं .

झरना तो अक्सर मेरे भीतर भी बहता है उससे कहता हूं कि वह अपनी कथा कहे. यो ,वह मेरे आदेश का पालन नहीं करता, अनुनय विनय भी नहीं सुनता .वह झरना है जब मन होता है तब झरता है अब वह झर रहा है आओ सुने उसकी आवाज. कल्पना की उंगली पकड़ देखें उसके आत्मकथा कहां जाती है.

मै झरना हूं पर्वत के ऊपर शिखर पर मेरा जन्म हुआ है , कैसे हुआ जन्म ?मेरी जननी है, बर्फ . जनवरी के महीने में नैनीताल की ऊंची पहाड़ी से लेकर निचले हिस्से तक हिमपात होता है .नीचे की बर्फ तो यूं ही पिघल कर झील का हिस्सा हो जाती है.

मेरा सफर लंबा है मुझे जन्म तब मिला जब बर्फ को सूरज की उजली गर्म किरणों ने छुआ .बर्फ उस अहसास से धीरे-धीरे पिघलने लगी और एक बहुत पतली पवित्र से धार पर्वत की चोटी से नीचे उतरने लगी .मुझे अपने जन्म से ही यात्रा शुरू करनी पड़ी ऊंचाई पर जन्म लेकर सदा नीचे की ओर बहना गिरना और आहात होना मेरी नियति बन गया नीचे उतरते गिरते मेरा आकार बड़ा .

अनुभव ने मेरी सूरत भी बदल दी इतनी चट्टाने मेरे रास्ते में आए लेकिन मैं रुका कभी नहीं कितने पेड़ों की जड़ें उनके तने और उनकी पत्तियां तक मुझसे भीगती रही किसी पेड़ ने कभी मुझसे नाराज़गी प्रकट नहीं कि सब ने यही कहा धन्यवाद झरने तुमने हमें जल दिया.

 

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